हाथ में मोबाइल, पढ़ाई का बहाना...कहीं आपका बच्चा गलत कंटेंट का शिकार तो नहीं?

Online content Parental control: आज के डिजिटल दौर में स्मार्टफोन जितना जरूरी हो गया है, उतना ही खतरनाक भी साबित हो सकता है। बच्चों की पढ़ाई में अब स्मार्टफोन की अहम भूमिका है। स्कूल के मैसेज, ऑनलाइन क्लास, होमवर्क, प्रोजेक्ट और दूसरी शैक्षणिक गतिविधियों के लिए मोबाइल का इस्तेमाल सामान्य बात हो गई है। हालांकि, इस सुविधा का कई बच्चे गलत तरीके से इस्तेमाल भी करने लगे हैं। कई माता-पिता बच्चों को यह सोचकर मोबाइल देते हैं कि वे पढ़ाई करेंगे, लेकिन कई मामलों में बच्चे उसी फोन पर ऑनलाइन गेम, हिंसक वीडियो, अश्लील सामग्री और दूसरे अनुचित कंटेंट देखने लगते हैं। यही वजह है कि अब बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है।
क्यों बढ़ रही है चिंता?
ऑनलाइन पढ़ाई के कारण बच्चों का स्क्रीन टाइम पहले की तुलना में काफी बढ़ गया है। इंटरनेट पर लगभग हर तरह का कंटेंट उपलब्ध है, लेकिन हर सामग्री बच्चों के लिए उपयुक्त नहीं होती।
डिजिटल विशेषज्ञों का कहना है कि इंटरनेट के एल्गोरिदम (Algorithm) भी बड़ी भूमिका निभाते हैं। अगर बच्चा एक बार किसी गलत कंटेंट को देख लेता है, तो एल्गोरिदम उसी तरह के और वीडियो या पोस्ट दिखाने लगता है। इससे बच्चे लगातार ऐसे कंटेंट के संपर्क में आने लगते हैं, जो उनकी उम्र और मानसिक विकास के लिए सही नहीं होता। इसलिए विशेषज्ञ माता-पिता को बच्चों की डिजिटल गतिविधियों पर निगरानी रखने की सलाह देते हैं।
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इन संकेतों को नजरअंदाज न करें
अगर आपका बच्चा इनमें से कुछ व्यवहार करने लगा है, तो सतर्क होने की जरूरत है—
-आपके आते ही मोबाइल की स्क्रीन बदल देना या फोन लॉक कर देना।
-किसी को अपना मोबाइल नहीं दिखाना।
-पढ़ाई के नाम पर घंटों कमरे में अकेले मोबाइल चलाना।
-देर रात तक फोन का इस्तेमाल करना।
-परिवार के लोगों से बातचीत कम कर देना।
-छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा या चिड़चिड़ापन दिखाना।
-मोबाइल के बिना बेचैन महसूस करना।
बच्चों को किन ऑनलाइन खतरों का सामना करना पड़ सकता है?
विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों को इंटरनेट पर कई तरह के जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है, जैसे—
-अश्लील और वयस्क सामग्री
-हिंसक वीडियो
-साइबर बुलिंग
-ऑनलाइन गेमिंग की लत
-सोशल मीडिया की लत
-फर्जी लिंक और ऑनलाइन ठगी
-अनजान लोगों से संपर्क
ये सभी चीजें बच्चों के मानसिक और सामाजिक विकास पर नकारात्मक असर डाल सकती हैं।
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माता-पिता क्या करें?
विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों पर केवल पाबंदियां लगाने के बजाय उनके साथ दोस्ताना व्यवहार करना ज्यादा प्रभावी होता है। बच्चों से रोज बात करें कि उन्होंने इंटरनेट पर क्या देखा और क्या सीखा। मोबाइल में पैरेंटल कंट्रोल और Safe Search जैसे फीचर हमेशा चालू रखें। बच्चों का स्क्रीन टाइम नियमित रूप से जांचें। पढ़ाई के दौरान मोबाइल का उपयोग सीमित रखने की कोशिश करें। समय-समय पर ब्राउज़र हिस्ट्री और अन्य ऐप्स की गतिविधियों की समीक्षा करें। बच्चों को सुरक्षित इंटरनेट उपयोग के नियम समझाएं और ऑनलाइन खतरों के बारे में जागरूक करें।
डिजिटल सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी
जानकारों का कहना है कि कम उम्र में बिना निगरानी इंटरनेट का इस्तेमाल बच्चों के मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक विकास पर गहरा असर डाल सकता है। लगातार गलत कंटेंट देखने से बच्चों का व्यवहार बदल सकता है। पढ़ाई में रुचि कम होने लगती है, गुस्सा और चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है, नींद प्रभावित होती है और कई बार बच्चे साइबर बुलिंग, ऑनलाइन ठगी या अनजान लोगों के संपर्क में आने जैसे गंभीर खतरों का भी शिकार हो सकते हैं।
इसलिए केवल बच्चों को मोबाइल देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके इस्तेमाल पर नियमित नजर रखना भी उतना ही जरूरी है। स्मार्टफोन न पूरी तरह अच्छा है और न पूरी तरह बुरा। ये इस बात पर निर्भर करता है कि इसका इस्तेमाल किस तरह और किसलिए किया जा रहा है।
कंटेंट- नेहा कुमारी
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